प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 32 of 43
(राग विभास)
प्रात समै दोऊ रस लंपट,
सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल। [1]
श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर
भूषन अंगहिं अंग विकूल॥ [2]
कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि,
वदन कमल मानौं अलि भूल। [3]
(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे,
नैंन बैंन कटि सिथिल दुकूल॥[4]
- श्री हरिवंश महाप्रभू, श्री हित चौरासी (3)
(राग विभास) प्रात समाइ दो रस लानपत, सुरत जय जुट जय जुट अति पूर्ण। [1]. [4] - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (3)