बनी श्रीराधा मोहन की जोरी
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 35 of 43
(राग सारंग)
प्रीति न काहु की कानि बिचारै।
मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै॥ [1]
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।
ज्यौं नादहि मन दियें कुरंगनि प्रगट पारधी मारै॥ [2]
(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै।
नाइक निपून नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (42)
(राग सारंगा) प्रीति न काहू की कानि बिचारै। व्यथित मन का एकमात्र समाधान बुराई के मार्ग पर चलना है। [1] जैसे-जैसे जल का प्रवाह बढ़ता है, सिंधु अपने मुहाने की ओर मुड़ जाती है। जैसे ही मेरा दिल चमकता है, मेरा शरीर स्पष्ट हो जाता है। [2] (जय श्री) हित हरिवंश में सब रंग भर गए, मानो मेरे शरीर में रोशनी भर गई। नायक निपुण नवल मोहन बिनु कौन अपनापौ हरै.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (42)