काहे कौं मान बढ़ावतु है
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 39 of 43
(राग कान्हरौ)
सुधंग नाचत नवल किसोरी।
थेई थेई कहति चहति प्रीतम दिसि, वदन चंद मनौं त्रिषित चकोरी॥ [1]
तान बंधान मान में नागरि देखत स्याम कहत हो हो होरी।
(जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अँग अँग, बरवस लियौ मोहन चित चोरी॥[2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (78)
(राग कान्हरौ) सुधंग नाचत नवल किसोरी। वो कहती थी कि मुझे मेरा पति चाहिए, मैं बहुत दिनों की प्यासी हूं.. [1] मन में शहर देखकर, मैं सियाम कहती थी. (जय श्री) हित हरिवंश मधुरी अंग अंग, बरवस लियौ मोहन चित छोरी..[2] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (78)