राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल

Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 40 of 43

(राग धनाश्री) तेरे नैंन करत दोऊ चारी। अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी॥ [1] विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परैं, लटकि रही लट न्यारी। उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी॥ [2] परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी। (जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी॥ [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (21) (राग धनाश्री) तेरे नैनन करत दोऊ चारी। कह नहीं सकता कि मुझे कुंज विहारी मिल गई.. [1] विट्ठुरी मांग कुसुम गिरि गिरि परैं, नशा निराला है। तुम्हारे नखों की रेखाएँ दिखाई दे रही हैं, जहाँ दुरावती सुन्दर है.. [2] परी ने कुएँ से पानी भरकर मिट्टी के घड़े पर गैंती रखी है, बीच में एक सुन्दर स्त्री है। (जय श्री) हित हरिवंश रसिकानि भामिनी, अप्सोस अंग अंग भारी.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (21)
काहे कौं मान बढ़ावतु हैबनी श्रीराधा मोहन की जोरी