दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही

Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 4 of 43

(राग धनाश्री) आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कलपतरु तीर री सजनी। सरद विमल नभ चंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी॥ [1] चंपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी। देसी सुधंग राग रँग नीकौ, ब्रज जुवतिनु की भीर री सजनी॥ [2] मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी। (जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा, हरति मदन घन पीर री सजनी॥ [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (24) (राग धनश्री) अजु गोपाल रस रस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी। सरद विमल नभ छंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी।।[1] चणपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक किर री सजनी। देसी सुधंग राग रंग निकौ, ब्रज जुवाटिनु की भीर री सजनी..[2] माघव मुदित निसाण बजाऊ, व्रत छंदयौ मुनि धीर री सजनी। (जय श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा, हरति मदन घन पीर री सजनी.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (24)
आजु देखि व्रज सुन्दरी मोहन बनी केलिबनी श्रीराधा मोहन की जोरी