राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल

Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 8 of 43

अधर अरुन तेरे कैसे कै दुराऊँ। [1] रबि ससि संक भजन कियौ अपबस अद्भुत रंगनि कुसुम बनाऊँ॥ [2] शुभ कौशेय कसि ब कौस्तुभ मणि पंकज सुतनि लै अँगनि लिपाऊँ। [3] हरषित इंदु तजत जैसे जलधर सो भ्रम ढूंढि कहाँ हौं पाऊँ॥ [4] अंबुन दंभ कछू नहि ब्यापत हिमकर तपै ताहि कैसै कै बुझाऊँ। [5] हित हरिबंश रसिक नवरँग पिय भृकुटी भौंह तेरे षंजन लराऊँ॥ [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (14) आदरणीय अरुण, मैं आपसे कैसे डर सकता हूँ? [1]. [3] हर्षित इंदु जैसा जल का जादू मैं कहां पा सकता हूं? [4] मैं बर्फ़ और अनकमे पैसे का दर्द कैसे बुझा सकता हूँ? [5] हित हरिवंश रसिक नवरंग पिया भृकुटी भोन्ह तेरे षंजन लारौं.. [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (14)
प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनीअति ही अरुन तेरे नयन नलिन री