ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित
Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 9 of 26
मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं। [1]
दर्बी लैकें मूढ़ जरावत हाथ कौं॥ [2]
(जय श्री) हित हरिवंश प्रपंच विषय रस - मोह के। [3]
(हरि हाँ) बिनु कंचन क्यों चलैं पचीसा लोह के॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)
कौन मनुष्य और कौन ब्रजनाथ? [1] दरबी लइकन मुढ़ा जरावत हाथ कौन.. [2] (जय श्री) हित हरिवंश प्रपंच रुचि और लगाव का विषय है। [3] (हरि हान) हम कंचन के बिना क्यों जाएँ? [4] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)