ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 15 of 26

तनहिं राखि सत्संग में मनहिं प्रेमरस भेव। सुख चाहत हरिवंश हित, कृष्ण कल्पतरू सेव॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.2) मैं सत्संग में अकेला रह जाता हूं, मेरा हृदय प्रेम से भर जाता है। सुख की अभिलाषा, हरिवंश हित, कृष्ण कल्पतरु सेव.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.2)
तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधेतेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं