ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 17 of 26

तू बालक नहिं, भर्यौ सयानप काहे कृष्ण भजत नहिं निके। [1] अतिव सुमिष्ट तजिव सुरभिन-पय मन बंधित तंदुल-जल फीके॥ [2] (जैश्री) हित हरिवंश नर्क गति दुरभर यम द्वारै कटियत नक छीके। [3] भव-अज कठिन, मुनिजन दुर्लभ, पावत क्यौं जु मनुज-तन भीके॥ [4] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4) आप बच्चे नहीं हैं, आप बुद्धिमान व्यक्ति हैं, आपको कृष्ण की पूजा नहीं करनी चाहिए। [1] अतिव सुमिष्ठा तजीव सुरभिना-पे मन बंधित तंदुला-जल फीका.. [2] (जयश्री) हरिवंश मारो नरक गति टिकाऊ नहीं यम दवाइ कटियात। [3] आज कठिन है, संत दुर्लभ हैं, मनुज-तन क्यों भेजूं.. [4] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (4)
तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिंना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित