देहु निकुंज निवास स्वामिनी
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 12 of 37
जाऊँ वाकी बलिहारी, पावन ब्रजरज परसावै री।
कालिन्दी को दरस करावै, शीतल जल अचवावै री॥ [1]
गुण नहीं भूलौं वाके, राधा-माधव छवि छकावै री।
‘ललितलड़ैती' सो दृग चंदा, जो मोंहि युगल मिलावै री॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष
जौं वाकी बलिहारी, पवन ब्रजराज परसावै री। तूने कालिंदी को सताया, शीतल जल प्रकट हुआ.. [1] गुण मत भूलो, राधा-माधव की छवि प्रकट हुई। 'ललितालदैति' सो दृग चंदा, जो प्रिय युगल से मिलें.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी करुणा व्यंग्य