झूलत ये दोऊ रूप अपार
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 13 of 37
(राग मल्हार व किन्नरी)
झूलत ये दोऊ रूप अपार।
भानु किशोरी गोरी भोरी, छवि निधि नन्द कुमार॥ [1]
घन दामिनि दीनें गलबाहीं, छिन-छिन बाढ़त प्यार।
ललित लड़ैती या सुख ऊपर, सरबस दीजै वार॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (25)
(राग मल्हार वे किन्नरी) झूले के ये दोनों रूप अपार हैं। भानु किशोरी गोरी भोरी, छवि निधि नंद कुमार। [1] घन दामिनी दीनेन गलाबहिं, छिना-छिन धर प्रेम। ललित लड़ैती या सुख ऊपर, सरबस दीजै वर.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वन कुंजन झूलन लीला (25)