करुणा करि वन वास दीजिए
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 14 of 37
(राग देश वा जिला)
करुणा करि वन वास दीजिए क्यों मम सुरति विसारी।
टहल महल तें छेंक दई हा कौन चूक चित्त धारी॥ [1]
यद्यपि मेटि मेंड निगमागम मैं सब भाँति बिगारी।
ललित लड़ैती तनमन अकुलित दुख नहिं जात सहारी॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)
(राग देश या जिल्ला) करुणा कारी वन वास दीजी क्यों मम सुरति विसारि। तहल महल तेन छेंक दाई हा कौन चुक चित धारी.. [1] लेकिन मेथी मेंड निगमगम में मैं हर तरह से खराब हो गया। ललित लड़ैती तनमन अकुलित साध नहीं जात सहरि.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (08)