मो सम कौन कुटिल अविचारी

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 17 of 37

(राग परज व खम्माच) मो सम कौन कुटिल अविचारी। जिंहिं रसना रस नाम त्याग के, निशिदिन बातें बकत लबारी॥ [1] जे अखियाँ तज युगल रूप रस, छकी रहत नित नेह सुत-नारी। जे कर दम्पति चरण पलोटत, लगे हरन परधन दुख भारी॥ [2] निशिदिन आस वास वृन्दावन, रूप सुधारस पीवौं प्यारी। कृपा दृष्टि दुख हेरो मो तन, ललित लड़ैती शरण तिहारी॥ [3] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (11) (राग परज वे खम्माचा) मो सैम जो कुटिल और विचारहीन है। जो लोग रसन रस का नाम छोड़ देते हैं, वे निशिदिन बातिन की बात करते हैं। [1] सभी कहानियों में युगल रूप रस, छकि रहत नित नेह सुता-नारी। दंपत्ति जब पैर जोड़ते हैं तो सारे भारी दुख दूर हो जाते हैं। [2] निशिदिन अस वास वृन्दावन, रूप सुधरस पिवौं प्यारी। दया, दुःख, वीर का शरीर, ललित लड़ैती, शरण तिहारी.. [3] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी, कृपा, व्यंग्य, शील (11)
माल खजाना हीरा मोतीजापै चढ़े युगल को रंग