भानुनन्दिनी मो तन हेरो
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 19 of 37
(राग ईमन)
नन्दलाल मो तन दुख हेरो।
श्री व्रज-रज पावन दरसाबहु, जासौं सहजें होय निवेरो॥ [1]
उक-चूक सब क्षमो साँवरे, हा-हा, अब न करो अवसेरो।
ललित लड़ैती देहु कृपा करि, श्रीवृन्दावन कुंज बसेरो॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)
(राग इम्ना) नंदलाल मो तन दुख हीरो। श्री व्रज-रज पवन दरसबाहु, जासौं सहजे होय निवेरो। [1] उका-चुक, सभी को खेद है, हा-हा, अब ऐसा मत करो। ललित लड़ैती देहु कृपा करि, श्री वृन्दावन कुंज बसेरो.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (16)