पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 20 of 37

(राग खम्माच) पड़त हौं पैयां कुञ्ज विहारिनी गौरांगी वृषभानु दुलारी। [1] करुणा स्वांति बून्द हों चातक मुख छबि चन्द चकोरी प्यारी॥ [2] औसर नहीं अवसेर करन को सुन लीजै दरखास्त हमारी। [3] ललित लड़ैती देहु बास व्रज पुरिवौ आस भानुपुर वारी॥ [4] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (26) (राग खम्माचा) मैं कुंजा विहारिणी गौरांगी वृषभानु दुलारी के चरणों में गिरता हूं। [1] करुणा स्वांती दम हो चटक मुख छवि चंद चकोरी प्यारी.. [2] करुणा शांति प्यारी हमारी बात सुनो, अवसर की नहीं। [3] ललित लड़ैती देहु बस व्रज पुरिवौ अस भानुपुर वारि.. [4] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (26)
भानुनन्दिनी मो तन हेरोप्रान पिया प्रीतम प्यारे को