रे मन क्यों चाटे जग धूर
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 24 of 37
(राग योगिया कालिंगड़ा)
रे मन क्यों चाटे जग धूर।
धन जोबन यों जाय हाथ तें, जा विधि उड़त कपूर॥ [1]
मात तात भ्राता सुत दारा, यह नाते सब कूर।
ललित लड़ैती बस वृन्दावन, ब्रजरज मिल ह्वै चूर॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (33)
(राग योगिया कलिंगदा) मन संसार को क्यों चाटे? धन जोबन यो जय हाथ तेन, जा विधि उद्रत कपूर.. [1] मत तत् भरत सुत दारा, ये नाता सब कुरा। ललित लड़ैती बस वृन्दावन, ब्रजराज मिल हाईवे.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (33)