श्यामा श्याम लगन जिहिं लागै
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 29 of 37
(राग झंझोटी)
श्यामा श्याम लगन जिहिं लागै।
नैनन नीर फुहारे छूटैं मन दम्पति छबि पागै॥ [1]
हा राधा हा मोहन कहि मुख उठि कुञ्जन कों भागै।
ललित लड़ैती बस वृन्दावन अनत न कहुँ अनुरागै॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (40)
(राग झंझोटी) श्याम श्याम लगन जिहिन लागै। मेरा मन बिना आँखों वाले एक जोड़े की छवि से भर गया। [1] हे राधा, हे मोहन, मेरा मुख ऊपर उठा और कुंजन भाग गया। ललित लड़ैती, मैं कहता हूं वृन्दावन अनत अनुरागाई.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (40)