देहु निकुंज निवास स्वामिनी
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 30 of 37
वृन्दावन के वास की, सदा रही मन आस।
निरखत दम्पति छबि दृगन, कुंजन रास विलास॥
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (9)
मेरा मन सदैव ऐसा रहे मानो मैं वृन्दावन में निवास करता हूँ। निरखत युगल छवि दृगन, कुंजन रस विलास.. - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, माधुर्य रस दोहावली (9)