युगल लाल रसना रट मनुआ
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 34 of 37
(राग कालिंगड़ा)
युगल लाल रसना रट मनुआ यही कलि में धन तेरो।
अनत कहाँ भटकत तू डोले कर श्री वनहिं बसेरो॥ [1]
टूक मांगकै उदर जु भर लै कहा मान यह मेरो।
ललित लड़ैती चरण शरण रहु जासों होय निबेरो॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (32)
(राग कलिंगदा) युगल लाल रसना रत मनुआ यही काली में धन तेरो। कहाँ-कहाँ भटकते रहते हो? श्री वाणी धाम.. [1] तुमने मुझसे पेट भरने को कहा और कहा, यह मेरा मन है। ललित लड़ैती, मेरे प्रियतम के चरणों में ऐसे रहो जैसे तुम मेरे प्रिय हो.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (32)