हे स्वामिनि हर्षामिनि भामिनि अब मेरी सुधि लीजै

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 35 of 37

(राग खम्माच) हे स्वामिनि हर्षामिनि भामिनि अब मेरी सुधि लीजै। हा हा करी बिगाड़ भाँति बहु भूल माफ कर दीजै॥ [1] दीन टेर सुनि देखि गरीबी ज्यौं त्यों ही अपनीजै। ललित लड़ैती श्री वृन्दावन रज अधिकारी कीजै॥ [2] - श्री ललित लड़ैती जी, श्री किशोरी करुणा कटाक्ष, विनय (25) (राग खम्माच) हे स्वामिनी हर्षमिनी भामिनी, अब मेरा ख्याल करो। हा हा कारी, मेरी बुरी भूलों को क्षमा कर दो.. [1] जिस दिन मैं तुम्हारी बात मान लूंगा, तुम्हारी गरीबी ज्यों की त्यों दूर हो जाएगी। ललित लड़ैती श्री वृन्दावन राज अधिकारी किजै.. [2] - श्री ललित लड़ैती जी, श्री किशोरी करुणा व्यंग्य, विनय (25)
युगल लाल रसना रट मनुआललित लड़ैती कुँवरि बिनु और न कछुक सुहाई