भानुनन्दिनी मो तन हेरो

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 4 of 37

(राग ईमन) भानुनन्दिनी मो तन हेरो। तपत रहत मन विषय वासना, शीतल दृष्टि कृपा कण गेरो॥ [1] खोल लेहु दरबार स्वामिनि, हा-हा अब न करो अवसेरो। ललित लड़ैती तन मन अकुलित, श्री वृन्दावन देहु बसेरो॥ [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (15) (राग इम्ना) भानुनंदिनी मो तन हीरो। मेरा दिल वासना से गर्म है, मेरी आंखें अनुग्रह से ठंडी हैं... [1] मैं अपना दरबार खोलूंगा, मालकिन, हा-हा, अब अवसर करो। ललित लड़ैती, तन मन अखण्ड, श्री वृन्दावन तन बसै.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (15)
देहु निकुंज निवास स्वामिनीदेहु निकुंज निवास स्वामिनी