देहु निकुंज निवास स्वामिनी

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 5 of 37

(राग भैरवी वा पीलू /जिला) देहु निकुंज निवास स्वामिनी, भूल-चूक तजि लखि निज ओरी। सुनी न देखी त्रिभुवन में कहुँ, तुम सम ललित मनोहर जोरी॥ [1] युगल चन्दमुख निरखन के हित, प्यासे मरत हैं नयन चकोरी। ललित लड़ैती देर करो जनि, हा हा पुरिवो आस किशोरी॥ [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (06) (राग भैरवी वा पिलु/जिला) देहु निकुंज निवास स्वामिनी, भूला-चुक तजि लखि निज ओरी। सुनो या देखो त्रिभुवन, मन में कहूँ तुम ललित मनोहर जोरी.. [1] युगल चंद्रमुख निरखण का हिट, नयन चकोरी प्यास से मर रहा है। ललित लड़ैती, विलंब डार्लिंग, हा हा पूर्वो अस किशोरी.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (06)
भानुनन्दिनी मो तन हेरोदेहु निकुंज निवास स्वामिनी