देहु निकुंज निवास स्वामिनी
Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती
Verse 7 of 37
(राग भैरवी व यमन)
एक आस तुव चरनन प्यारी।
बहुत गई यह बयस वृथा ही सेवत विषय करत अघ भारी॥ [1]
युगल नाम मुख रटौं निरन्तर, नयनन देखूँ छबि तुम्हारी।
ललित लड़ैती देहु चरण रति करुणालय वल लेहु संभारी॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (5)
(राग भैरवी वे यम्ना) एक अस तुव चरणन प्यारी। वस्तु-सेवा का यह स्वाद निरर्थक और भारी है। [1] युगल का नाम निरन्तर स्मरण रहे, नयन तुम्हारी छवि देखे। ललित लड़ैती देहु चरण रति करुणालय वल लेहु संभारी.. [2] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (5)