मेरे तो गिरिधर ही गुणगान

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 15 of 28

(राग कल्याण) मेरे तो गिरिधर ही गुणगान। यह मूरत खेलत नयनन में , यही हृदय में ध्यान॥ [1] चरण रेणु चाहत मन मेरो, यही दीजिये दान॥ ‘कृष्णदास’ कौ जीवन गिरिधर मंगल रूप निधान॥ [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1089) (राग कल्याण) मैं गिरिधर के ही गुण गाता हूँ। यः मूरत खेलत नयनं पुरुष, यः हृदय पुरुष ध्यान।
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंतमो मन गिरधर छबि पै अटक्यो