मो मन गिरधर छबि पै अटक्यो
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 16 of 28
(राग पूर्वी)
मो मन गिरधर छबि पै अटक्यो।
ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै,
चिबुक चारु गड़ि ठटक्यो॥ [1]
सजल स्याम घन वरन लीन ह्वै,
फिर चित्त अनत न भटक्यो।
'कृष्णदास' किये प्राण निछावर,
यह तन जग सिर पटक्यो॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1090)
(राग पूर्वी) मो मन गिरधर छवि पै अटक्यो। ललित त्रिभंगा चल पै चली कै, चिबुक चारु गदै थाक्यो.. [1] सजल स्याम घन वरन लिन ह्वै, फिर चित अनात न भटक्यो। 'कृष्णदास' ने प्राण त्यागे, यह तन, संसार और सिर क्या जाने.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1090)