नाँचत मोहन संग राधिका

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 18 of 28

(राग भुपाली व मालव) नाँचत मोहन संग राधिका ब्रज जुवतिन के जूथ लिए। बाहु परसपर जोरी प्रेम बस, मुदित गंड पर गंड दियें॥ [1] कंकन कुनित रुनित बर नूपुर, सुनत श्रवण खग उपरनियें। बाजत ताल रसाल सरस गति, मालव राग सुदेस गियें॥ [2] सुघर संगीत प्रबिन नागरी, तिरप लेत आनन्द हियें। लटकत सीस सुभग पग पटकट, वदत श्याम हो-होव कियें॥ [3] सुख भर भरित परस्पर मंडल, सस्मित रस लोचनन पियें। जै श्री कृष्णदास हित वदत सदा यह, वृथा कहा सत कल्प जियें॥ [4] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (640) (राग भूपाली और मालवा) राधा सहित ब्रज जुवतिन के झूठ-झूठ नाचत मोहन। बहु परस्पर प्रेम, बस मुद्रित गोंद पर चिपकाओ.. [1] कंकण कुणित रुणित बर नुपुर, सुनत श्रवण खग उपरणिया। बाजत ताल रसल सरस गति, मालव राग सुदेस गइयां.. [2] सुघर संगीत प्रबीन नगरी, तिरप लेट आनंद हिएन। लटकत सीस सुभग पग पटकट, वदत श्याम हो-होव केन..[3] भारत प्रत्यक्ष मण्डल हर्षोल्लास से परिपूर्ण, सममित रस लोचनन पीयो। जय श्री कृष्णदास हित वदत सदा यः, वृथा कहा सत कल्प जियेन.. [4] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (640)
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंतपोढ़े श्री राधा के गेह