न्यांइरी तू अलकलडी

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 12 of 23

(राग कानरौ) न्यांइरी ! तू अलकलडी। निसि वासर गिरिधरन लाल के, हृदे में रहति गडी॥ [1] तौही लों सुख जौलों समीपु रहै, एक निमिख भावत नाहिं घडी। कुँभनदास स्वामिनि राधा है, व्रज - जुवतिन मांझ बडी॥ [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (271) (राग कनारौ) न्यानिरी! आप एल्केल्डी हैं. गिरिधरन लाल की निसि वासर, हिरदे मन रहति गादी.. [1] तौहि लोन सुख जौलौं सपू रहा, एक निमिख भावत नहि घड़ी। कुम्भनदास की पत्नी राधा हैं, व्रज - जुवतिन मंझ बड़ी.. [2] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी के वचन (271)
नंद-नंदन की बलि-बलि जैयेपोढ़े हरि राधिका के संग