पोढ़े हरि राधिका के संग

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 13 of 23

(राग विहाग) पिय-संग झूली री ! सरस हिंडोरैं। ब्रज-जुबती चहुं दिसि तें सजि सजनी ! झुलवति थोरैं-थोरैं॥ [1] नीलांबर पीताम्बर राजत घन-दामिनि चित चोरैं। कुंभनदास प्रभु गिरिधर देखत छबि की उठत झकोरैं॥ [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (112) (राग विहागा) पिया संग झूले! सारस हिंडोरेन. ब्रज-जुबति चहुँ दिसि तेन सजि सजनि! झूलावती थोरन-थोरैन.. [1] नीलांबर पीतांबर रजत घन-दामिनी चित चोरैन। छवि देख कुम्भनदास प्रभु गिरिधर कांप उठे। [2] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास के वचन (112)
न्यांइरी तू अलकलडीपोढे हरि राधिका के भवन