प्रगटी नागरि रूप-निधान
Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास
Verse 16 of 23
(राग गंधार)
प्रगटी नागरि रूप-निधान।
निरखि-निरखि फूलति व्रज- वनिता नांहिन उपमा कों आन॥ [1]
उपमा कों जे जे कहियतु हैं ते जु भए निरवान।
'कुंभनदास' लाल गिरिधर की जोरी सहज समान॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)
(राग गंधार) प्रगति नागरी रूप-निधान। निरखि-निरखि फुलति व्रजा- वनिता नन्हीं उपमा कोन अन.. [1] उपमा कोन जे जे कहियातु हैं ते जू भे निर्वाण। 'कुंभनदास' लाल गिरिधर की जोरी सहज समान.. [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी की वाणी (8)