प्रगटी राधा रूप निधान

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 17 of 23

(राग देव गन्धार) प्रगटी राधा रूप निधान। देखि देखि बूझत जो परस्पर नहीं त्रिभुवन में आन॥ उपमा को जेजे कहियत हैं तेहु भये निरवान। कुम्भन दास लाल गिरधर की जोरी सहज समान॥ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8) (राग देव गंधार) प्रगति राधा रूप निधान। देखिये, देखिये, जो एक दूसरे को नहीं बुझाते, त्रिभुवन पुरुष अन.. उपमा कहत जे, तेहु भये निर्वाण। कुम्भन दास लाल गिरधर की जोरी सहज समान.. - श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)
प्रगटी नागरि रूप-निधानरस में रहत गढ़ी हो रसिकनी