रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 18 of 23

प्रेम सरोवर प्रेम की, भरी रहे दिन रैन। जहँ जहँ प्यारी पग धरत, श्याम धरत तहँ नैन॥ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी प्यार प्यार की झील है, दिन भर बारिश होती रहती है। जहां भी प्रेमपूर्ण चरण हैं, वहां अंधेरी धरती पर आंखें हैं... - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी के शब्द
प्रगटी राधा रूप निधानरस में रहत गढ़ी हो रसिकनी