रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 19 of 23

(राग कन्हारो एवं विहागरौ) रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी। कनक बेलि वृषभानु नंदनी श्याम तमाल चढ़ी॥ [1] विहरत संग लाल गिरिधर के कौन भाँति पढ़ी। ‘कुम्भन दास’ लाल गिरधर संग रति रस केलि वढी॥ [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (172) (राग कान्हारो एवन विहागरौ) रसिकानि वह है जो रस में रहती है। कनक बेली वृषभानु नंदनी श्याम तमाल छाधि।।[1] विहार सहित लाल गिरिधर का पाठ किसे अच्छा लगता है? 'कुंभन दास' लाल गिरधर संग रति रस केलि वादी.. [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी की वाणी (172)
रस में रहत गढ़ी हो रसिकनीसखी मोय बूँद अचानक लागी