बनी राधिका गिरधर की जोरी

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 3 of 23

(राग सारंगsara) बनी राधिका गिरधर की जोरी। मनहु परस्पर कोटि मदन रति की सुन्दरता चोरी॥ नूतन श्याम नन्द के नन्दन वृषभान सुता नव गोरी। मनहु परिमल बदन चंद को पवित चकोर चकोरी॥ कुम्भन दास प्रभु रसिक लाल बहु विध रसिकनी निहोरी। मनहु परस्पर रंग बढ्यो अति कि उपजी प्रीत न थोरी॥ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (171) (राग सारंगसार) जोरी बानी -राधिका गिरधर. एक दूसरे के हृदय के प्रेम की शोभा सुंदर है... नूतन श्याम नंद के नंदन वृषभान सुता नव गोरी। मनहु परिमल बदन चंद को पवित्र चकोर चकोरी.. कुम्भन दास प्रभु रसिक लाल बहु विध रसिकानि निहोरी। प्रेम बहुत अधिक प्रेम की उपज नहीं है... - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी के शब्द (171)
आये माई बरषा के अगवानीभगतकौ कहा सीकरी काम