रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी

Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास

Verse 21 of 23

सींवा नैंननि तेरे की। अव नहिं दृष्टि दुरांउ री प्यारी सखि! सुनु जिय मेरे की॥ [1] कमल, मीन, मृग-जूथ भुलाने वर कटच्छ फेरे की। ‘कुंभनदास' प्रभु गिरिधर रिझवति भ्रुव-विलास घेरे की॥ [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (170) तुम्हारी दादी के बहनोई. अरे नहीं दृष्टि दुरान के प्यारे दोस्त! मेरी सुनो जियो.. [1] कमल मृग, झूठ भूलो, वन में फिरो। 'कुंभनदास' प्रभु गिरिधर रीझवति भरुवा-विलास घेरे के... [2] - श्री कुंभनदास, श्री कुंभनदास जी के वचन (170)
सखी मोय बूँद अचानक लागीतेरे तन की उपमा कौं देख्यौ