मेरो मन तौ हरि के संग गयो
Kumbhandas Vani — श्री कुम्भनदास
Verse 6 of 23
(राग नट नारायण)
गिरिधर पिय के हृदवसी तेरे बदन की परम सुदेस छबि।
एक अंग के रूप के आग जात सखि ! कोटिसत चंद्रमा दवि॥ [1]
नैन अंस की सोभा वरनि सकै एसौ कौन कवि ?
'कुंभनदास' स्वामिनि राधिका ! इहै गति तोहि कों यों आइ फवि॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (163)
(राग नट नारायण) परम सुदेश छवि तुम्हारी देह की, गिरिधर पिया के हृदय वासी। एक शरीर रूप का दूसरा जाति मित्र! कोटिसत चन्द्रमा देवी.. [1] आँखों की सुन्दरता की प्रशंसा किस कवि ने की है? 'कुंभनदास' स्वामिनी राधिका! यह गति का मार्ग है... [2] - श्री कुम्भनदास, श्री कुम्भनदास जी के वचन (163)