गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज

Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव

Verse 10 of 32

गुरु निरमोही चाहिए, शिष्य न छाँड़ै नेह। बिलगाये बिलगै नहीं, एक प्राण द्वै देह॥ - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (21) गुरु को मोह से मुक्त होना चाहिए और शिष्य को परिवर्तन नहीं करना चाहिए। बिलगाय बिलगाय नहीं, एक जीवन और शरीर दो.. - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (21)
गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रजगुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज