गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज
Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव
Verse 9 of 32
धरौ बुरौ, धरिबौ बुरौ, आवै सोई पाव।
श्रीकुंजबिहारी लाल के, उमँगि - उमँगि गुन गाव॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (32)
धरौ बुराउ, धरिबौ बुराउ, आवै सोई पाव। श्री कुंजबिहारी लाल की, उमंगी-उमंगी गुण गाव.. - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (32) प्रेमपूर्ण स्नेह भी अनुचित है और संचित वास्तु धारण करना भी अनुचित है। हमें जो कुछ भी मिले उसका उपयोग समभाव से करना चाहिए। अत: मनुष्य को केवल श्यामा-कुंजबिहारी की ही शरण में रहना चाहिए और आनंदपूर्वक उनके दिव्य गुणों का निरंतर जप करना चाहिए।