गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज
Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव
Verse 22 of 32
प्रान प्रिया सखि आजु बनि।
ओढे नीलांबर विहरत रति काम केलि रस माँझ सनी॥ [1]
उमंगी उमंगी मिलि कुँवरि स्याम तन औरैं ठान ठनी।
श्रीललितमोहनी लाड लडावत त्यौं त्यौं बरषत प्रेम घनी॥ [2]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (54)
प्रिय मित्र आज. ओधे नीलानबर विहार रति काम कीलि रस मंज सानि.. [1] उत्साहवर्द्धक उत्साह मिलि कुंविरि स्यामा तन औरैं थानि। श्री ललितमोहिनी, लड़ो, लड़ो, पलटो, बरसाओ, प्रेम सघन है.. [2] - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (54)