गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज
Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव
Verse 23 of 32
सो पापनि कौ मूल है, एकहि पैसा रोक।
हरिजन बाँध्यौँ गाँठि सों, तौ छूटे हरि सों थोक॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (22)
तो पाप की जड़ कौन है, एक पैसे पर ही रुक जाओ। हरिजन बंध्याउं गांठि पुत्र, ताऊ छोटे हरि पुत्र ठोक.. - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (22)