जाहि वृन्दावन नहि भावे। सो यहाँ काहे कौं मूंड मुडावै॥

Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव

Verse 27 of 32

जाहि वृन्दावन नहि भावे। सो यहाँ काहे कौं मूंड मुडावै॥ - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (15) जहां वृन्दावन का अहसास नहीं होता। तो यहाँ नेता कौन है? - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू (15) के वचन, सिद्धांत
आजु बधाई श्रीवृन्दावनआजु बधाई श्रीवृन्दावन