बिहारी तेरे नैंना रूप भरे
Lalit Mohini Vani — श्री ललित मोहिनी देव
Verse 5 of 32
(राग सुहा बिलावल)
बिहारी तेरे नैंना रूप भरे।
निरखि निरखि प्यारी राधे कों अनत न कहूँ टरे॥ [1]
सुख कौ सार समूह किसोरी उमँगि उमँगि अंकौ भरे।
श्रीललितमोहिनी की निजु जीवनि उर सों उरजि अरे॥ [2]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (43)
(राग सुहा बिलावाला) बिहारी, अपनी आँखों में सौंदर्य भर लो। निरखि निरखि प्रियतम, कौन अनंत तारे कहूँ मैं? [1] ख़ुशी का सार क्या है? श्री ललितमोहिनी की स्वयं की जीवनी एवं पुत्र उराजी.. [2] - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के छंद (43)