॥ दोहा॥

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 17 of 65

॥ दोहा॥ या अनन्य-ब्रत-पोत के, हौ तुम खेवनहारि। मोहिं कृपा करि देहु अँग, सँग सेवा सुकुँवारि॥ ॥ पद॥ मोहि कृपा करि दीजिये अंग संग की सेवा। अहो बिहारिनि लाडिली मेरें तुम देवा॥ या अनन्य-ब्रत पोत के हौ तुमही खेवा। श्रीहरिप्रिया जू सौं सौंह दै पुछौ किनि भेवा॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (२९) (दोहा) श्रीलालजू श्रीराधारानी से कहते हैं, मेरी एकमात्र आपके अंग-संग सेवा करने की ही अभिलाषा है, अतः आप कृपा करके यह सेवा मुझे प्रदान करें। सेवा-सम्बन्धी मेरे इस अनन्य व्रत को आप ही पूर्ण कर सकती हैं। मेरे इस सेवा-सम्बन्धी अनन्य व्रत-रूपी जहाज के तुमही पार लगाने वाले मल्लाह हो। (पद) हे बिहारिणी लाड़ली! मेरी एकमात्र तुम ही उपास्य देव हो। कृपा करके अपने अंग-संग की सेवा प्रदान करें। मेरे इस सेवा-सम्बन्धी अनन्य व्रत-रूपी जहाज के तुमही पार लगाने वाले मल्लाह हो। श्रीहरि-प्रियाजू सखी से सौगन्ध दिलवाकर इसका अभिप्राय क्यों नहीं पूछती हो?
मोहि कृपा करि दीजिये, अंग संग की सेवा। बड़े भाग पाई जु हम, जीवन प्रान-अधारि।