(दोहा)
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 19 of 65
(दोहा)
कुंजनि कुंजनि डोलहीं हो, मत्त मराल की चाल।
मूरति प्रेम सिंगार की, रँगभीने दोउ लाल॥
(पद)
रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल।
मूरति प्रेम सिंगार की सोहैं सहज स्वरूप रसाल॥
कुंजनि कुंजनि डोलहीं हो मत्त मराल की चाल।
बात कहत मुसकात जात दोउ दियें भुजा अँकमाल॥
गोरी कंचनबेलि-सी (हो) जोरी स्याम-तमाल।
बसहु निरन्तर (श्री) हरिप्रिया हिय में आनन्द रूपरसाल॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, उत्साह सुख (30)
(दोहा) कुंजनि कुंजनि डोलाहिं हो, शार्क की तरह मत चलो। मुराती प्रेम सिंगार की, रंगभिन दोउ लाल.. (कविता) रंग-बिरंगी लड़ाई, रंगभिन मोहनलाल. मुराति प्रेम सिंगार के सोहन सहज स्वरूप रसाल.. कुंजनि कुंजनि दोलाहिं हो मत्त मराल की चाल। लेकिन कहते हैं मस्कट जुट दो दियां भुजा अंकमल.. मेला कंचनबेलि-सी (हो) जोरी स्यामा-तमाल। बसहु स्थिर (श्री) हरिप्रिया हय पुरुष आनंद रूपरासल.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह और प्रसन्नता (30)