सुखकारी सबके सदा

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 21 of 65

(दोहा) सफल मनोरथ होत सब, आवत हियें जितेक। मेरे नैननि को अरी, यह अहार हैं एक॥ (पद) अरी मेरे नैननि को आहार। कल न परै पल एक बिना मोहिं अवलोकें सुखसार॥ [1] सकल मनोरथ सफल होत तब करत हियें संचार। श्री हरिप्रिया प्रान-जीवन-धन कौ यह सुरत बिहार॥ [2] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37) (दोहा) श्री हरिप्रिया सखी कहती हैं—हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रियतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं। (पद) हे सखि! मेरे नेत्रों का एकमात्र आहार यही है। सुख-सारस्वरूप प्रिया-प्रीतम के विहार-दर्शन बिना मुझे एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। [1] जब इस विहार की छवि-माधुरी मेरे हृदय में प्रवाहित होती है, तभी मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। श्रीहरिप्रिया जी कहती हैं — रसिक दम्पती का यह सुरति-विहार ही मेरे प्राणों का जीवन-धन है। [2]
सुखकारी सबके सदासुखकारी सबके सदा