(दोहा)
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 3 of 65
(दोहा)
कल न पर छिन बिन लखे, तो मुख चंद्र प्रभाव।
अहो प्रिया कछु परिरह्यो, मेरो सहज सुभाव॥
(पद)
सहज सुभाव रह्यो परि मेरौ।
कल न परें छिन अवलोके विन बदनचन्द्र प्यारी जू तेरौ॥
पलकन ओट होत सन तें मोहिं कोटत आय अटूट अँधेरौ।
श्रीहरिप्रिया जोरि करसों कर करत बीनती ह्वै कें चेरौ॥ ३॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (3)
(दोहा) कल न होय, छिनै बिन लाख न होय, मुख में चन्द्रमा का प्रभाव। अहो प्रिया कछु परिरहयो, मेरो सहज सुभाव.. (श्लोक) सहज सुभाव रहयो परि मेरौ. कल छीन ली मैंने तेरे प्यारे चाँद की आँखें... पलकों में अँधेरा है और कितना अँधेरा है। श्री हरिप्रिया, जो अपनी पूरी शक्ति से प्रार्थना करती हैं.. 3.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (3)