सुखकारी सबके सदा

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 42 of 65

(दोहा) अङ्ग अङ्ग रसरङ्ग पर, कोटि काम बलिहार। बिहरें बिपिन बिहार दोउ, सुन्दर वर सुकुँवार॥ (पद) बिहरें बिपिन बिहारी बिहारनि। मानि मानि मन मोद परस्पर तनक न मानत हारनि॥ [1] अङ्ग अङ्ग रसरंग तरङ्गनि कोटि काम बलिहारनि। श्रीहरिप्रिया अटकि रहे दोऊ निज निज नैंन निहारनि॥ [2] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (79) (दोहा) सुन्दर शिरोमणि परम सुकुमार श्रीप्रियाप्रियतम वृन्दाविपिन में विहार कर रहे हैं। दिव्य प्रम-सौन्दर्य से ओतप्रोत उनके अंग-प्रत्यंग पर कोटि-कोट कामदेव न्यौछावर हैं। (पद) श्रीप्रियाप्रियतम श्रीवृन्दावन में नाना प्रकार से विहार कर रहे हैं। ये श्रीनित्य विहारी विहारिणी दोनों प्रेमरस से मतवाले होकर एक दूसरे को बार-बार अङ्गीकार करते हुए मानों परस्पर जूझ रहे हैं और किंचित् भी हार नहीं मान रहे हैं। [1] इनके अङ्ग प्रत्यंग से दिव्य प्रेम-रस की तरङ्ग उठ रही हैं जिन पर कोटि-कोटि कामदेव न्यौछावर हैं। श्रीहरिप्रिया सहचरी कहती हैं कि इस दिव्य क्रीड़ा विलास में पारस्परिक अङ्ग कान्ति की शोभा को अपने-अपने नेत्रों से निरखते हुए ये दोनों स्तब्ध से हो रहे हैं ! [2]
सुखकारी सबके सदासुखकारी सबके सदा