सुखकारी सबके सदा
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 48 of 65
भ्रमत रहत निसिदिन छिना, छके अधिक रस नेह।
प्यारी तुव पद कंज पर, मो दृग मधुकर एह॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)
वह हर समय असमंजस में रहती थी, लेकिन इसमें उसकी कोई विशेष रुचि नहीं थी। प्यारी तुव पद नज पार, मो दृग मधुकर एह.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)