सुखकारी सबके सदा

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 49 of 65

(दोहा) तुम बिन स्वामिनि सुखनिधे, को समुझे यह मर्म। मोहिं देहु पद परम प्रिय, है जु तुमहिं सब सर्म॥ (पद) प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म। प्रनतन पाल कृपाल कृसोदरि है तिहरो यह धर्म॥ [1] तुम बिन अहो सुकुँवारि सिरोमनि को समुझै निज मर्म। श्रीहरिप्रिया स्वामिनी सुखनिधि है जु तुमहिं सब सर्म॥ [2] - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (98) (दोहा) श्रीलाल जू अत्यंत प्रसन्न होकर श्री स्वामिनी जू के चरणारविंदों को पकड़कर कहते हैं—हे सुख की निधान श्री स्वामिनी जू! आपके बिना इस मर्म को कौन समझ सकता है? जो आपके हैं, उनकी रक्षा करने की लाज आपको ही है। मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि इन चरणों की कृपा मुझ पर सदा बनी रहे। (पद) हे प्रियाजू ! आप मुझको इन चरणारविन्दों की सेवा प्रदान करें। हे कृशोदरी ! जो आपके आश्रित हैं उनकी रक्षा करना आपका धर्म है। [1] हे सुकमारशिरोमणी ! आपके बिना मेरे निज मर्म की बात कौन समझ सकता है। आप ही मेरे सुख की निधान हैं। हे श्रीहरिप्रिया की स्वामिनी, हे सुख की निधान, मेरी आर्त दूर नहीं होने से आपको ही शरम लगेगी। [2]
सुखकारी सबके सदासुखकारी सबके सदा