राधा माधव भैंट भई
Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य
Verse 57 of 65
(राग आसावरी)
जै जै वृन्दावन रजधानी,
जहाँ विराजत मोहन राजा श्री राधा सी महारानी।
सदा सनातन एक रस जोरी महिमा निगम न जानी।
श्री हरिप्रिया हितु निज दासी रहती सदा अगवानी।
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (31)
(राग असावरी) जय जय वृन्दावन, राजधानी जहां मोहन राजा, श्री राधा रानी राज करती हैं। सदा सनातन एक रस जोरि महिमा निगम जानता है। मेरी दासी श्री हरिप्रिया सदैव आपका स्वागत करती हैं। - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (31) सभी रसिक संतों की राजधानी श्री वृन्दावन धाम की जय, जय, जहाँ श्री राधा सर्वोच्च रानी ('रानी') हैं और श्रीकृष्ण राजा ('महाराजा') हैं। हाँ, वृन्दावन का दिव्य युगल और शाश्वत अमृत शाश्वत है, जिसकी दिव्यता वेदों की समझ से परे है। दिव्य युगल के सेवक श्री हरिप्रिया सहचारी सदैव दिव्य निवास अर्थात श्री वृन्दावन की ओर देखते रहते हैं।