कहि न परै सोभा या सुख की।

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 60 of 65

कहि न परै सोभा या सुख की। मेंरे नैननि कौ सरबस धन जीऊँ देखि - देखि दुति मुख की॥ और कछु भावत नहि जियमें लगी रहौ लग इक याही रुख की। श्रीहरिप्रिया करत रहौ निसिदिन अति अद्रभुत बरिषा पीयूष की॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (14) इससे बड़ी कोई ख़ुशी नहीं है. मैंने अपने ननिहाल की सारी दौलत देखी है - मैंने अपने चेहरे की सुंदरता देखी है.. और मेरे जीवन में कोई भावना नहीं है, मैं उसी स्थिति में रह गया हूं। श्री हरिप्रिया, नित्य पीयूष की अद्भुत कृपा बनाये रखें.. - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (14)
जुगल किसोर किसोरी जोरी, गोरी श्याम तमाल।सुखकारी सबके सदा